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15 साल तक बैठे-बैठे सोने से लेकर चैन की साँस तक: एम्स डॉक्टरों ने हाई-रिस्क हार्ट पेशेंट की ज़िंदगी बदली

नई दिल्ली : गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए उन्नत हृदय उपचार कैसे जीवन बदल रहे हैं, इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण एम्स, नई दिल्ली में देखने को मिला। यहाँ डॉक्टरों ने एक 57 वर्षीय मरीज पर सफलतापूर्वक ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वाल्व इम्प्लांटेशन (TAVI) प्रक्रिया की, जिसे पहले पारंपरिक ओपन-हार्ट सर्जरी के लिए बहुत अधिक जोखिम वाला माना गया था। 135 किलो वजन वाले इस मरीज को गंभीर एओर्टिक वाल्व रोग था, साथ ही कई अन्य बीमारियाँ और हृदय की कार्यक्षमता (LVEF) मात्र 15% रह गई थी। इस वजह से उसे पारंपरिक वाल्व रिप्लेसमेंट सर्जरी के लिए अस्वीकार कर दिया गया था। सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि मरीज की बिगड़ती हालत ने उसकी जीवन-गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित किया था। लगभग 15 वर्षों तक वह लेटकर सो नहीं पाया और सांस फूलने के कारण उसे बैठकर ही सोना पड़ता था। मामले की जटिलता को देखते हुए एम्स की बहु-विषयक हार्ट टीम ने मरीज का गहन मूल्यांकन किया और TAVI प्रक्रिया की सिफारिश की—यह एक न्यूनतम इनवेसिव तकनीक है जिसमें बिना ओपन-हार्ट सर्जरी किए वाल्व बदला जा सकता है। 29 मिमी Sapien 3 Ultra Resilia वाल्व का उपयोग कर यह प्रक्रिया सफलतापूर्वक की गई। टीम में शामिल थे: प्रो. नितीश नाइक, वरिष्ठ परामर्शदाता एवं कार्डियोलॉजी प्रोफेसर (पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त) डॉ. रविंदर सिंह राव, चेयरमैन, RHL हार्ट सेंटर, हेड – कॉम्प्लेक्स एंजियोप्लास्टी – TAVI प्रोग्राम, वरिष्ठ परामर्शदाता इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी, लीलावती अस्पताल, मुंबई डॉ. अमिताभ सत्संगी, असिस्टेंट प्रोफेसर – CTVS प्रक्रिया के बाद मरीज ने उल्लेखनीय सुधार दिखाया—लक्षणों में कमी और हृदय की कार्यक्षमता में स्पष्ट सुधार। डॉ. रविंदर सिंह राव ने कहा, “गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस और एडवांस्ड हार्ट फेल्योर वाले मरीजों के पास अक्सर सीमित विकल्प होते हैं। जब सर्जरी संभव नहीं होती, TAVI एक सुरक्षित और प्रभावी विकल्प साबित होता है। यह केस दिखाता है कि समय पर हस्तक्षेप, उन्नत तकनीक और सहयोगी हार्ट टीम दृष्टिकोण से सबसे हाई-रिस्क मरीज भी उत्कृष्ट परिणाम पा सकते हैं।” विशेषज्ञों ने बताया कि TAVI अब उन मरीजों के लिए पसंदीदा विकल्प बनता जा रहा है जो उच्च या निषेधात्मक सर्जिकल जोखिम में हैं। पारंपरिक सर्जरी की तुलना में यह कैथेटर-आधारित प्रक्रिया कम आघात पहुँचाती है, जल्दी रिकवरी देती है और सही मरीजों में बेहतर परिणाम देती है। एम्स के विशेषज्ञों ने ज़ोर दिया कि ऐसे जटिल मामलों की सफलता हार्ट टीम मॉडल पर निर्भर करती है, जहाँ इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट, कार्डियक सर्जन, इमेजिंग विशेषज्ञ, एनेस्थेसियोलॉजिस्ट और क्रिटिकल केयर एक्सपर्ट मिलकर मरीज का मूल्यांकन और प्रबंधन करते हैं।

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IFFD 2026 : स्वतंत्र फ़िल्में – अवसर और चुनौतियाँ

IFFD 2026 के CineXchange मंच पर स्वतंत्र सिनेमा की वास्तविकताओं पर एक महत्वपूर्ण चर्चा हुई। इस सत्र में विंटा नंदा, अरन्या सहाय, तनमय शेखर, मोलश्री, बरनाली रे शुक्ला, पुबाली चौधरी और डिंपल दुगर जैसे प्रतिष्ठित फ़िल्मकार शामिल हुए। चर्चा का केंद्र स्वतंत्र फ़िल्मों के सामने आने वाली चुनौतियाँ और अवसर रहे। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि स्वतंत्र सिनेमा का सबसे बड़ा संघर्ष वित्तीय संसाधनों की कमी है। बड़े बजट और स्टारकास्ट के अभाव में इन फ़िल्मों को निवेशकों और वितरकों का समर्थन मिलना कठिन होता है। विंटा नंदा ने कहा कि स्वतंत्र फ़िल्में समाज की सच्चाइयों और अनकही कहानियों को सामने लाती हैं, लेकिन इन्हें बनाने के लिए साहस और धैर्य की आवश्यकता होती है। अरन्या सहाय ने इस बात पर ज़ोर दिया कि डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ने स्वतंत्र फ़िल्मों को नई ऊर्जा दी है। पहले जहाँ थिएटर रिलीज़ ही एकमात्र विकल्प था, वहीं अब ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ने इन फ़िल्मों को वैश्विक दर्शकों तक पहुँचाने का अवसर दिया है। तनमय शेखर ने कहा कि कहानी कहने की शैली ही स्वतंत्र सिनेमा की सबसे बड़ी ताक़त है, जो इसे मुख्यधारा से अलग पहचान देती है। बरनाली रे शुक्ला और पुबाली चौधरी ने वितरण की चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि स्वतंत्र फ़िल्मों को थिएटर तक पहुँचाना अब भी कठिन है, लेकिन फ़िल्म महोत्सव और डिजिटल माध्यम इनकी आवाज़ को बुलंद कर रहे हैं। वहीं डिंपल दुगर ने कहा कि सहयोग और नेटवर्किंग ही स्वतंत्र फ़िल्मकारों के लिए आगे बढ़ने का रास्ता है। इस सत्र से यह निष्कर्ष निकला कि स्वतंत्र सिनेमा भारतीय फ़िल्म उद्योग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो नई कहानियों और प्रयोगशीलता को जन्म देता है। चुनौतियाँ चाहे कितनी भी हों, अवसर भी उतने ही व्यापक हैं। IFFD 2026 का यह संवाद स्वतंत्र फ़िल्मों के भविष्य को दिशा देने वाला साबित हुआ।

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फ़िल्म वितरण में बदलते रुझान: IFFD 2026 में CineXchange पर गहन चर्चा

IFFD 2026 के तीसरे दिन आयोजित CineXchange सत्र में भारतीय फ़िल्म वितरण के बदलते परिदृश्य पर उद्योग के दिग्गजों ने विचार साझा किए। इस चर्चा में संजय राम, अनिल थडानी, जी.पी. विजयकुमार और गायत्री गुलियानी जैसे प्रमुख वितरकों ने भाग लिया। उन्होंने बताया कि कैसे पारंपरिक थिएटर रिलीज़ और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के बीच संतुलन लगातार बदल रहा है। पहले जहाँ फ़िल्मों की सफलता का पैमाना केवल बॉक्स ऑफिस कलेक्शन होता था, वहीं अब ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म और डिजिटल स्ट्रीमिंग ने दर्शकों तक पहुँचने के नए रास्ते खोल दिए हैं। अनिल थडानी ने कहा कि बड़े बजट की फ़िल्में अब भी थिएटर में रिलीज़ होकर ही अपनी पहचान बनाती हैं, लेकिन छोटे और मध्यम बजट की फ़िल्मों के लिए डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म एक सुरक्षित विकल्प बन चुके हैं। संजय राम ने इस बात पर ज़ोर दिया कि क्षेत्रीय सिनेमा को डिजिटल माध्यम से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दर्शक मिल रहे हैं। जी.पी. विजयकुमार ने वितरण रणनीतियों में लचीलापन अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि दर्शकों की बदलती पसंद को ध्यान में रखते हुए निर्माताओं को थिएटर और डिजिटल दोनों माध्यमों का संतुलित उपयोग करना चाहिए। वहीं गायत्री गुलियानी ने यह स्पष्ट किया कि भविष्य में सहयोगी मॉडल ही सफल होंगे, जहाँ निर्माता, वितरक और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म मिलकर काम करेंगे।

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📰 विशेषज्ञ राय: भारतीय शिक्षा प्रणाली में बदलाव की आवश्यकता

भारत की शिक्षा प्रणाली लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि आज की तेज़ी से बदलती दुनिया में हमारी शिक्षा पद्धति को भी समय के साथ बदलना चाहिए। केवल किताबों और परीक्षाओं पर आधारित शिक्षा अब पर्याप्त नहीं है; हमें बच्चों को व्यावहारिक ज्ञान, रचनात्मकता और आलोचनात्मक सोच सिखाने की ज़रूरत है। पारंपरिक शिक्षा बनाम आधुनिक आवश्यकताएँ विशेषज्ञ बताते हैं कि पारंपरिक शिक्षा प्रणाली में रटने पर ज़ोर दिया जाता है। छात्र परीक्षा पास करने के लिए पढ़ते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन की समस्याओं को हल करने की क्षमता विकसित नहीं कर पाते। विशेषज्ञ राय: शिक्षा मनुष्य को केवल नौकरी के लिए तैयार करने का साधन नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसे समाज का जिम्मेदार नागरिक बनाने का माध्यम होना चाहिए। तकनीकी युग में शिक्षा आज का समय डिजिटल और तकनीकी प्रगति का है। विशेषज्ञों का कहना है कि कोडिंग, डेटा एनालिसिस और डिजिटल साक्षरता को स्कूल स्तर पर शामिल करना चाहिए। ऑनलाइन शिक्षा और ई-लर्निंग प्लेटफ़ॉर्म छात्रों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने का अवसर देते हैं। कौशल आधारित शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा केवल डिग्री तक सीमित नहीं होनी चाहिए। कौशल विकास जैसे संचार कौशल, टीमवर्क, समस्या समाधान और नेतृत्व क्षमता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना चाहिए। व्यावसायिक प्रशिक्षण (Vocational Training) से छात्रों को रोजगार के बेहतर अवसर मिल सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य और शिक्षा शिक्षा केवल ज्ञान देने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह बच्चों के मानसिक विकास से भी जुड़ी है। विशेषज्ञ राय है कि स्कूलों में काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए। छात्रों पर अत्यधिक दबाव डालने के बजाय उन्हें सीखने का आनंद दिलाना ज़रूरी है। भारतीय संस्कृति और शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा में भारतीय संस्कृति और मूल्यों को भी शामिल करना चाहिए। योग, ध्यान और नैतिक शिक्षा बच्चों को संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। यह उन्हें वैश्विक नागरिक बनने के साथ-साथ अपनी जड़ों से भी जोड़े रखता है। विशेषज्ञ राय स्पष्ट है: भारत की शिक्षा प्रणाली को आधुनिक समय के अनुरूप बदलना होगा। हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो बच्चों को केवल परीक्षा पास करने वाला छात्र नहीं, बल्कि जिम्मेदार, रचनात्मक और आत्मनिर्भर नागरिक बनाए।

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