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हेल्थकेयर सेक्टर में कौशल विकास और मरीजों की देखभाल में निरंतरता के लिए भारत-यूके के बीच सहयोग की पहल

मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्स और बैपियो ट्रेनिंग एकेडमी ने आयुष मंत्रालय के सहयोग से आयुष डॉक्टरों के प्रशिक्षण के लिए विशेष पहल की घोषणा की दिल्ली : मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्स और बैपियो (BAPIO) ट्रेनिंग एकेडमी ने भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के साथ मिलकर आज दिल्ली में आयोजित इंडो-यूके हेल्थकेयर कॉन्क्लेव के दूसरे संस्करण में आयुष डॉक्टरों (बीएचएमएस और बीएएमएस) के क्लीनिकल कौशल को उन्नत करने की दिशा में कदम उठाने की घोषणा की। कॉन्क्लेव का उद्घाटन भारत सरकार के आयुष राज्य मंत्री श्री प्रतापराव गणपतराव जाधव ने किया। कॉन्क्लेव में स्ट्रक्चर्ड एजुकेशन, सुपरवाइज्ड क्लीनिकल ट्रेनिंग और एसेसमेंट के माध्यम से हेल्थकेयर सेक्टर में कौशल विकास और मरीजों की देखभाल में निरंतरता पर फोकस किया गया। इन पहलों में आयुष के स्नातक और स्नातकोत्तर डॉक्टरों के लिए छह-छह महीने के दो सर्टिफिकेट प्रोग्राम शामिल हैं। इनका उद्देश्य डॉक्टरों के क्लीनिकल कौशल को बढ़ाना, मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और हेल्थकेयर सिस्टम के भीतर देखभाल की निरंतरता (कॉन्टिन्यूटी ऑफ केयर) बनाए रखने में मदद करना है। “स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और नवाचार के बीच सेतु” (ब्रिजिंग हेल्थकेयर, एजुकेशन एंड इनोवेशन) विषय पर आयोजित दो दिवसीय कॉन्क्लेव में भारत और ब्रिटेन के नीति-निर्माता, चिकित्सक, शिक्षाविद, स्वास्थ्य क्षेत्र के वरिष्ठ अधिकारी और नवाचार से जुड़े विशेषज्ञ हिस्सा ले रहे हैं। यह कॉन्क्लेव 2025 में ब्रिटेन में आयोजित पहले संस्करण की अगली कड़ी है। पहले संस्करण की अध्यक्षता सांसद और इंडो-यूके हेल्थकेयर अलायंस के चेयर डॉ. संजय जायसवाल ने की थी। इस पहल का जोर विचार-विमर्श को व्यावहारिक कार्यक्रमों और दीर्घकालिक संस्थागत साझेदारियों में बदलने पर है। इस अवसर पर भारत सरकार के आयुष राज्य मंत्री श्री प्रतापराव गणपतराव जाधव ने कहा, “इंडो-यूके हेल्थ कॉन्क्लेव 2026 भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच दीर्घकालीन मित्रता, परस्पर सम्मान तथा निरंतर सुदृढ़ होती राजनीतिक साझेदारी का प्रतीक है। भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच चिकित्सा, शिक्षा तथा वैज्ञानिक प्रगति के क्षेत्र में सहयोग का एक समृद्ध इतिहास रहा है। हमारी सरकार का विशेष ध्यान स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभता, वहनीयता (अफॉर्डेबिलिटी), गुणवत्ता, निवारक स्वास्थ्य सेवाओं (प्रिवेंटिव हेल्थकेयर) तथा आधुनिक तकनीक के प्रभावी उपयोग पर केंद्रित है। भारत के पास पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों की एक अनूठी और अमूल्य विरासत है। आयुष मंत्रालय का दायित्व संभालते हुए मेरा दृढ़ विश्वास है कि जब इन पद्धतियों को वैज्ञानिक, अनुसंधान, उपयुक्त चिकित्सकीय प्रमाण, गुणवत्ता मानकों तथा जिम्मेदार समन्वय का समर्थन प्राप्त होता है, तब वे विश्वभर में निवारक स्वास्थ्य सेवाओं और समग्र कल्याण को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं।” उन्होंने आगे कहा कि यह सम्मेलन इस दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम है। बैपियो ट्रेनिंग एकेडमी और मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल ग्रुप के संयुक्त सहयोग से आयुष चिकित्सकों के लिए एक सुव्यवस्थित प्रशिक्षण एवं क्षमता विकास कार्यक्रम की शुरुआत हो रही है। इसका उद्देश्य आयुष चिकित्सकों की नैदानिक दक्षताओं को सुदृढ़ करना एवं उनकी व्यावसायिक क्षमताओं का विस्तार करना है। यूके के पास क्लीनिकल गवर्नेंस, व्यावसायिक जवाबदेही, मरीजों की सुरक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए सुव्यवस्थित प्रणालियों को विकसित करने का व्यापक अनुभव है। वहीं भारत के पास व्यापक चिकित्सकीय अनुभव, तकनीकी नवाचार, उच्च प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों का विशाल समूह तथा बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने की क्षमता है। यदि हम दोनों देशों की इन पूरक क्षमताओं को एक साथ लाएं तो ऐसी संस्थागत व्यवस्थाएं विकसित की जा सकती हैं, जो अधिक प्रभावी, मरीज केंद्रित, जवाबदेह तथा समाज की वास्तविक स्वास्थ्य आवश्यकताओं के अनुरूप हों। आयुष पेशेवरों के लिए सर्टिफिकेट प्रोग्राम : आयुष डॉक्टरों के क्लीनिकल कौशल से जुड़ी इस पहल में छह-छह महीने के दो सर्टिफिकेट प्रोग्राम तैयार किए गए हैं। इनमें ‘एक्यूट केयर एंड इमरजेंसी सपोर्ट’ और ‘लाइफस्टाइल हेल्थ एंड वेल-बीइंग काउंसलिंग एंड प्रैक्टिस’ सर्टिफिकेट प्रोग्राम शामिल हैं। दोनों प्रोग्राम आयुष के स्नातक और स्नातकोत्तर डॉक्टरों के लिए तैयार किए गए हैं। इनमें व्यवस्थित शिक्षण के साथ सुपरवाइज्ड प्रैक्टिकल ट्रेनिंग कराई जाएगी। एक्यूट केयर प्रोग्राम का उद्देश्य डॉक्टरों की क्षमताओं को विकसित करना तथा उन्हें इमरजेंसी विभागों एवं क्रिटिकल केयर यूनिटों में क्लीनिकल, प्रशासनिक और नेतृत्व संबंधी भूमिकाओं के लिए तैयार करना है। प्रशिक्षण में मरीज की स्थिति बिगड़ने के संकेतों को पहचानने, समय पर वरिष्ठ विशेषज्ञों तक मामले को रेफर करने, कम्युनिकेशन, डॉक्युमेंटेशन, मरीजों की सुरक्षा, इमरजेंसी रूम एवं क्रिटिकल केयर मैनेजमेंट के साथ-साथ मल्टीडिसिप्लिनरी टीम का हिस्सा बनकर ऑपरेशनल असिस्टेंस देने में सक्षम बनाने जैसे कदम शामिल हैं। लाइफस्टाइल हेल्थ प्रोग्राम में प्रिवेंटिव हेल्थ (निवारक स्वास्थ्य) और एविडेंस-इन्फॉर्म्ड काउंसिलिंग (प्रमाण-आधारित परामर्श) पर फोकस किया गया है। इसमें पोषण, शारीरिक गतिविधि, वेलनेस एवं लंबी उम्र तक स्वस्थ रहने, नींद, स्ट्रेस मैनेजमेंट, व्यवहार में बदलाव, हेल्थ चेक-अप और जरूरत पर मरीज को अन्य विशेषज्ञों के पास भेजने जैसे विषय शामिल हैं। इसका उद्देश्य अस्पतालों की वेलनेस सर्विसेज, प्रिवेंटिव हेल्थ डिपार्टमेंट और कॉरपोरेट या कम्युनिटी वेलनेस प्रोग्राम में सहयोग देना है। इस पहल पर मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्स के संस्थापक सदस्य, ग्रुप मैनेजिंग डायरेक्टर एवं सीईओ डॉ. राजीव सिंघल ने कहा, “हमारे लिए इस साझेदारी की अहमियत इस बात में है कि इससे मरीजों और हेल्थकेयर टीमों के लिए क्या बदलाव आता है। हमारा उद्देश्य हेल्थकेयर सिस्टम को लगातार मजबूत करना, भारत एवं ब्रिटेन के अनुभवों को साझा करना, इलाज के मानकों (स्टैंडर्ड ऑफ केयर) को बेहतर बनाना और गुणवत्ता तथा गवर्नेंस को मजबूत करना है, ताकि इसका अंतिम लाभ मरीजों को मिले। इस तरह के मंचों के माध्यम से होने वाली किसी भी साझेदारी की असली कसौटी यही है। आज घोषित की गई इस पहल में स्ट्रक्चर्ड क्लीनिकल ट्रेनिंग, सुपरवाइज्ड प्रैक्टिस और गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया गया है। ‘टीच, ट्रेन, ट्रीट’ यानी ‘सिखाना, प्रशिक्षित करना और इलाज करना’ की हमारी क्लीनिकल कॉरिडोर फिलॉसफी के माध्यम से हम इमरजेंसी एवं क्रिटिकल केयर के मामले में दीर्घकालिक क्षमता विकसित करने, प्रिवेंटिव केयर में सहयोग करने और ज्ञान के आदान-प्रदान से अधिक सुरक्षित मेडिकल केयर एवं नतीजे देने के लिए प्रयासरत हैं।” बैपियो ट्रेनिंग एकेडमी के सीईओ एवं इंडो-यूके हेल्थकेयर अलायंस के वाइस चेयर प्रो. पराग सिंघल ओबीई ने कहा, “भारत और ब्रिटेन दोनों के पास एक-दूसरे से सीखने के लिए बहुत कुछ है। हमारा उद्देश्य अस्पतालों में ट्रेनिंग, साझा शिक्षण, कठोर मूल्यांकन और क्लीनिकल सहयोग के माध्यम से इस आदान-प्रदान को व्यावहारिक बनाना है। इन पहलों को इस तरह से तैयार किया गया है, जिससे

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फोर्टिस शालीमार बाग ने एडवांस हार्ट फेलियर से पीड़ित 47-वर्षीय मरीज का सफल हृदय प्रत्यारोपण कर उन्हें सौंपा नए जीवन का उपहार, उत्तरी और पश्चिमी दिल्ली का पहला सफल हार्ट ट्रांसप्लांट

हृदय प्रत्यारोपण प्राप्तकर्ता चंचल यादव (केंद्र में)। फोर्टिस हॉस्पिटल, शालीमार बाग के डॉक्टरों ने 47 वर्षीय चंचल यादव का सफल हृदय प्रत्यारोपण कर उन्हें नया जीवन प्रदान किया। यह उत्तरी और पश्चिमी दिल्ली का पहला सफल हार्ट ट्रांसप्लांट है। डोनर हार्ट को पीजीएमआईएस रोहतक से फोर्टिस शालीमार बाग पहुंचाया गया, हरियाणा और दिल्ली पुलिस की मदद से तैयार ग्रीन कॉरिडोर की मदद से कुल 95 किलोमीटर का सफर मात्र 63 मिनट में पूरा किया गया नई दिल्ली : फोर्टिस हॉस्पीटल, शालीमार बाग के डॉक्टरों ने 47-वर्षीय मरीज श्री चंचल यादव का सफल हृदय प्रत्यारोपण (हार्ट ट्रांसप्लांट) कर उन्हें नया जीवन सौंपा है। यह उत्तरी और पश्चिमी दिल्ली में पहला सफल हार्ट ट्रांसप्लांट है। मरीज श्री यादव पिछले कई वर्षों से एडवांस हार्ट फेलियर की समस्या से जूझ रहे थे। इस दौरान मिले बेहतरीन मेडिकल उपचार के बावजूद उनके हृदय की पम्पिंग क्षमता लगातार कमजोर पड़ती रही थी, जिसके कारण वह बिस्तर तक सिमटकर रह गए थे और बहुत अधिक सांस फूलने तथा बार-बार, जीवनघाती हार्ट शॉक की समस्या से पीड़ित थे, जिसके लिए उन्हें इमरजेंसी डिवाइस इंप्लांटेशन की आवश्यकता थी। उनकी हालत इतनी बिगड़ चुकी थी कि पारंपरिक दवाएं भी काम नहीं कर रही थी, ऐसे में उन्हें बचाने के लिए हार्ट ट्रांसप्लांट ही एकमात्र विकल्प बचा था। डॉ दिनेश कुमार मित्तल, सीनियर डायरेक्टर एंड एचओडी, कार्डियोथोरेसिक एंड वास्क्युलर सर्जरी, फोर्टिस हॉस्पीटल, शालीमार बाग के नेतृत्व में डॉक्टरों की मल्टीडिसीप्लीनरी टीम ने हार्ट ट्रांसप्लांट की जिम्मेदारी को सफलतापूर्वक निभाया। इस मामले में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब पीजीआईएमएस रोहतक, हरियाणा में एक डोनर हार्ट उपलब्ध हुआ। इस संबंध में जानकारी मिलते ही, फोर्टिस शालीमार बाग की ट्रांसप्लांट टीम ने तत्काल डोनर हार्ट को प्राप्त करने और समय पर उसके रिट्रीवल तथा ट्रांसपोर्टेशन की प्रक्रिया शुरू कर दी। इसके बाद, भरपूर प्लानिंग और तालमेल के साथ, एक राज्य से दूसरे राज्य तक इस डोनर हार्ट को पहुंचाने के लिए समय के साथ होड़ शुरू हुई। इस पूरी प्रक्रिया को सफलतापूर्वक अंजाम देने के लिए, अस्पताल प्रशासन, ट्रांसप्लांट कॉर्डिनेटर्स, NOTTO, SOTTO के अलावा हरियाणा एवं दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने मिलकर ऑर्गेन एलॉकेशन, रिट्रीवल तथा ट्रांसपोर्टेशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। डोनर हार्ट को हरियाणा से दिल्ली लाने के लिए एक ग्रीन कॉरिडोर तैयार किया गया, जिसकी बदौलत रोहतक से फोर्टिस शालीमार बाग के बीच 95 किलोमीटर की दूरी महज़ 63 मिनट में तय की गई। इस तालमेल ने यह सुनिश्चित किया कि डोनर हार्ट बेहद कम समय में, यानी महत्वपूर्ण विंडो के दौरान, ट्रांसप्लांट सेंटर तक पहुंचे, ताकि कार्डियाक टीम को बिना देरी किए हार्ट ट्रांसप्लांट करने का मौका मिले। इस मामले की विस्तार से जानकारी देते हुए, डॉ दिनेश कुमार मित्तल, सीनियर डायरेक्टर एंड एचओडी, कार्डियोथोरेसिक एंड वास्क्युलर सर्जरी, फोर्टिस हॉस्पीटल, शालीमार बाग ने कहा, “हार्ट ट्रांसप्लांट को मेडिकल क्षेत्र में समय के लिहाज से काफी नाजुक प्रक्रिया माना जाता है, जिसमें एक-एक मिनट अंतिम परिणाम को प्रभावित करता है। रोहतक में डोनर हार्ट को निकाले जाने से लेकर यहां हमारे मरीज के शरीर में रक्त प्रवाह की बहाली करने तक, हर कदम पर हमने सावधानीपूर्वक प्लानिंग की और इसे सटीक तरीके से अंजाम दिया। हमारी ऑर्गेन रिट्रीवल, ट्रांसप्लांट सर्जरी, एनेस्थीसिया, परफ्यूज़न और क्रिटिकल केयर टीमों के बीच बेहतरीन तालमेल तथा तत्परता के साथ एक उद्देश्य के लिए कार्य भावना ने तथा टीमभावना ने इस चुनौती को सफलतापूर्वक पूरा किया। हमें खुशी है कि उक्त मरीज ट्रांसप्लांट के बाद स्वास्थ्यलाभ कर रहे हैं। मरीज की गंभीर हालत को देखते हुए, ट्रांसप्लांटेशन काफी नाजुक और जीवन-रक्षक प्रक्रिया थी, लेकिन डोनर हार्ट उपलब्ध नहीं होने पर मरीज की हालत में कोई खास सुधार नहीं हो सकता था।” हृदय प्रत्यारोपण के बाद चंचल यादव ने कहा, “मेरे पास फोर्टिस शालीमार बाग के डॉक्टरों, नर्सों और पूरी टीम के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए पर्याप्त शब्द नहीं हैं जिन्होंने मुझे दूसरा जीवन दिया है। जब मुझे पता चला कि मुझे हार्ट ट्रांसप्लांट करवाना जरूरी है, तो मैं और मेरे परिजनों के मन में डर और अनिश्चितता बढ़ गई। लेकिन अस्पताल की टीम ने जिस तत्परता और देखभाल की भावना तथा समर्पण के साथ इस पूरी प्रक्रिया में हमारा साथ दिया, उससे हमारी ताकत और उम्मीद बढ़ी। मैं डोनर परिवार के लिए भी हृदय से आभारी हूं, जिनके निःस्वार्थ और परोपकारी फैसले ने मुझे एक नया जीवन दिया है और मैं आगे की जिंदगी को लेकर आशावान हूं।” डॉ नरेश कुमार गोयल, प्रिंसीपल डायरेक्टर एंड एचओडी, कार्डियोलॉजी एंड हार्ट फेलियर प्रोग्राम, फोर्टिस हॉस्पीटल, शालीमार बाग, ने कहा, “मरीज को जब अस्पताल लाया गया था तो वह हार्ट फेलियर की एडवांस स्टेज में पहुंच चुके थे जिसमें ऑप्टिमल मेडिकल थेरेपी और एआईसीडी से उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हो सकता था। ऐसे में, हार्ट ट्रांसप्लांटेशन ही सबसे कारगर उपचार विकल्प रह गया था जिससे उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाया जा सकता था। हम डोनर परिवार की उदारता के लिए उनके प्रति आभार व्यक्त करते हैं, उनके इस परोपकार की बदौलत ही मरीज को स्वास्थ्यलाभ के साथ-साथ अधिक लंबा, और सक्रिय जीवन जीने का अवसर मिला है।” श्री महिपाल भनोत, सीनियर वाइस प्रेसीडेंट एंड रीजनल डायरेक्टर, ऑपरेशंस एंड ऑपरेशंस लीड – एनसीआर प्रोजेक्ट्स, फोर्टिस हेल्थकेयर ने कहा, “इस सफल प्रत्यारोपण ने एक बार फिर हमारी असाधारण क्लीनिकल क्षमताओं, चौबीसों घंटे कार्यरत समर्पित टीमों की योग्यता, तथा हमारी मल्टीडिसीप्लीनरी टीमों के आपातकालीन परिस्थितियों में भरपूर तालमेल को प्रमाणित किया है। अब जबकि दिल्ली में SOTTO लॉन्च किया जा चुका है, इस तरह की महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं लोगों को अंगदान के बारे में जागरूक बनाने और समुदाय के लिए वर्ल्ड-क्लास हेल्थकेयर प्रदान करने की हमारी प्रतिबद्धता को मजबूती देती हैं।” श्री नवीन शर्मा, वाइस प्रेसीडेंट एंड फेसिलिटी डायरेक्टर, फोर्टिस शालीमार बाग, ने कहा, “इस मामले में, NOTTO, हमारे ट्रांसप्लांट समन्वयकों, तथा दिल्ली एवं हरियाणा पुलिस अधिकारियों के बीच तालमेल रीढ़ की हड्डी की तरह मजबूत आधार साबित हुआ। सतर्कता और तत्परता ऐसे मामलों में डोनर ऑर्गेन को निर्धारित मंजिल तक समय पर पहुंचाने और उसके समुचित तरीके से इस्तेमाल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जिसने इस जटिल और विभिन्न चरणों में लगातार पेश आने वाली चुनौतियों को पार कर हमारी टीम भावना को और मजबूती दी है।” फोर्टिस हेल्‍थकेयर लिमिटेड : फोर्टिस हेल्‍थकेयर लिमिटेड ने भारत के

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Seed industry aims to raise India’s share of global seed trade from 1% to 10% by 2035 : FSII

Seed industry experts launched the report on vegetable seed market on 10th AGM of FSII Industry seeks a single national framework, faster approvals and stronger IP protection to boost innovation in oilseeds and pulses New Delhi : The Indian seed industry aims to raise India’s share of global seed trade from around 1% to 10% by 2035, while strengthening domestic innovation and self-reliance in strategically important crops such as oilseeds and pulses, the Federation of Seed Industry of India (FSII) said on Thursday. Setting out the goal at the FSII Knowledge Day 2026, held as part of its 10th Annual General Meeting in New Delhi, FSII said the industry, valued at $3.6 billion and expected to cross $5 billion by 2030, will contribute to Atmanirbharta in line with the vision of Prime Minister Narendra Modi. Ajai Rana, Chairman, FSII and MD & CEO, Savannah Seeds, said, “India has the science, the talent and the farmers to become a major player in the global seed market. Government initiatives such as the national Mission on High-Yielding Seeds are important steps. The industry is ready to invest more in research, especially in oilseeds and pulses.” Outlining the industry’s asks, he said, “We need a single national framework for seed regulation with predictable timelines, faster science-based approvals for new varieties, traits and technologies, and stronger protection of intellectual property, especially in oilseeds and pulses. This will give companies the confidence to make long-term investments.” The industry believes that there is merit in giving a decisive push to R&D investments as it is directly proportional to a nation’s GDP. “While developed countries spend about 3-4% of their GDP on R&D, our investment is much below one percent. Research suggests that every rupee spent on on R&D can give a return of Rs 13,” added Rana. Rana also said that there was need for the industry and government to work together. Citing edible oil import dependence, he added, “If government and industry can come together, we can achieve self sufficiency in edible oil in less than 10 years. The industry has developed mustard hybrids which give farmers yields of one tonne per acre adding significantly to their incomes, unlike wheat which gives less returns. If we can divert some land to mustard from wheat, this shall significantly enhance farmers income, while ensuring self-sufficiency, and reducing our import dependence.” Kishore Jaiswal, progressive farmer and Convenor, National Farmers’ Empowerment Initiative (NFEI), said, “Farmers adopt better seed once they see the results in their fields. Good seed gives us higher yields and better protection against pests and bad weather. Indian farmers want access to the latest seed technologies at the same time as farmers in other countries.” Experts also highlighted the growing economic and resilience value of improved seed technologies among vegetable farmers in India. Evidence from vegetable farmers across five major vegetable-producing states shows that 93% of farmers use hybrid seed, with 68% sourcing seed through dealers, while quality, cost and reliability remain key considerations in seed selection. “Our findings indicate that improved seed is translating into economic value, with an average cultivation cost of Rs 1.07 lakh per acre and an average reported return on investment (ROI) of 2.7x. Importantly, 85% of farmers reported improved crop resilience, while 61% considered contemporary varieties climate-ready, underlining the role of varietal innovation in helping farmers respond to changing growing conditions,” said Dr K Vijayaraghavan, Chairman and CEO, Sathguru Management Consultants, Hyderabad. A Report “Transformation of India’s Vegetable Seed Sector” prepared by Sathguru Management Consultants and Ministry of Foreign Affairs, Netherlands. The findings of the Report also point to an opportunity to unlock further value, with awareness and adoption of specific climate- and biotic-stress traits remaining limited and farmers continuing to rely on generic pesticide applications for crop protection. Also present were Dr. Paresh Verma, Director General, FSII; Marion van Schaik, Counsellor, Agriculture, Embassy of the Kingdom of the Netherlands, New Delhi; and Dr. Manish Diwan, GGM & Head, RDF, BIRAC.

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IAP के जॉइंट सेक्रेटरी (ईस्ट ज़ोन) डॉ. जोजी जॉन के खिलाफ यौन शोषण और धोखाधड़ी के आरोपों में FIR दर्ज, प्रेस क्लब दिल्ली में पीड़िता और वकीलों ने रखी बात

नई दिल्ली : दिल्ली के आईजीआई एयरपोर्ट पुलिस स्टेशन में इंडियन एसोसिएशन ऑफ फिजियोथेरेपिस्ट्स (IAP) के जॉइंट सेक्रेटरी (ईस्ट ज़ोन) डॉ. जोजी जॉन के खिलाफ एक महिला फिजियोथेरेपिस्ट की शिकायत पर मामला दर्ज किया गया है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि एक पेशेवर मेंटरशिप संबंध धीरे-धीरे भावनात्मक और व्यक्तिगत शोषण में बदल गया। 4 जून 2026 को दर्ज FIR (संख्या 0241) के अनुसार, शिकायतकर्ता ने डॉ. जॉन पर भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धाराओं 69, 75 और 79 के तहत आरोप लगाए हैं, जो धोखे से यौन संबंध, यौन उत्पीड़न और महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने से संबंधित हैं। शिकायत के अनुसार, अगस्त 2025 में दोनों की पहली बातचीत फेसबुक मैसेंजर के माध्यम से हुई थी। आरोप है कि डॉ. जॉन ने स्वयं को एक वरिष्ठ पेशेवर बताते हुए शिकायतकर्ता के करियर को मार्गदर्शन देने, पेशेवर नेटवर्क बनाने और फिजियोथेरेपी क्षेत्र में अवसर दिलाने का आश्वासन दिया। शिकायतकर्ता का कहना है कि शुरुआती पेशेवर बातचीत धीरे-धीरे व्यक्तिगत और भावनात्मक संबंधों में बदल गई। उन्हें करियर में उन्नति, पेशेवर पहचान, संगठनों में पद दिलाने, लेक्चर और प्रकाशन के अवसर तथा क्लिनिक स्थापित करने में सहायता का भरोसा दिया गया। FIR में उल्लेख है कि इन आश्वासनों के चलते शिकायतकर्ता भावनात्मक रूप से जुड़ गईं और अपने पेशेवर भविष्य को लेकर डॉ. जॉन पर भरोसा करने लगीं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि डॉ. जॉन ने स्वयं को शादीशुदा होने के बावजूद उनसे भावनात्मक रूप से जुड़े होने का दावा किया और कहा कि वे अपनी पत्नी से अलग रह रहे हैं।शिकायत के अनुसार, आरोपी ने 27 मार्च 2026 को अहमदाबाद से दिल्ली आने-जाने के लिए उनके टिकट की व्यवस्था की, जिसके बाद दोनों की दिल्ली में मुलाकात हुई। आरोप है कि इन वादों और भरोसे का इस्तेमाल कर उनसे व्यक्तिगत और यौन संबंध बनाए गए। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, नई दिल्ली में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पीड़िता ने मीडिया के सामने अपने आरोपों को विस्तार से रखा। उन्होंने कहा कि उनकी शिकायत के कुछ महत्वपूर्ण पहलू FIR में शामिल नहीं किए गए, जबकि उन्होंने इसकी जानकारी जांच अधिकारी को दी थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि घटना के दौरान उन्हें बिना जानकारी के कुछ पिलाया गया, जिसे FIR में दर्ज नहीं किया गया। पीड़िता ने बताया कि इस पूरे घटनाक्रम का उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ा। उन्होंने कहा, “इस घटना और इसके बाद की परिस्थितियों के कारण मैं अवसाद में चली गई थी। मुझे संभलने और आगे आने की हिम्मत जुटाने में समय लगा। अब मैं मजबूत महसूस कर रही हूं और न्याय की मांग के लिए सामने आई हूं। मैं निष्पक्ष जांच और उचित कार्रवाई चाहती हूं।” इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में पीड़िता के साथ उनके कानूनी सलाहकार और वकील भी मौजूद रहे, जिन्होंने मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई की जानकारी दी। इस मामले में शिकायतकर्ता की ओर से हितेन मेहता (लीगल एडवाइजर), भावसर एंड मेहता एंड कंपनी एडवोकेट कृति भावसर, भावसर एंड मेहता एंड कंपनी एडवोकेट एशना कुमार (एसोसिएट, भावसर एंड मेहता एंड कंपनी) सहयोग कर रहे हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पीड़िता और उनके वकीलों ने निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा कि मामले के सभी पहलुओं को गंभीरता से लिया जाए और सच्चाई सामने लाई जाए। फिलहाल मामले की जांच जारी है। अभी तक किसी भी पक्ष को दोषी नहीं ठहराया गया है।

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Safe Harbour: Building Secure Spaces for People, Businesses, and the Digital World

BY: Pankaj Bansal , Founder at NewsPatrolling.com सुरक्षित आश्रय (Safe Harbour) कंपनियों के लिए कंपनियों के लिए सुरक्षित आश्रय बनाने का अर्थ है ऐसी प्रणालियाँ स्थापित करना जो लचीलापन (resilience) को बढ़ावा दें। इसमें शामिल हैं: मज़बूत शासन पारदर्शी संचार नैतिक नेतृत्व वित्तीय अनुशासन प्रभावी जोखिम प्रबंधन जो संगठन व्यवसाय निरंतरता योजना, कर्मचारी कल्याण और ग्राहक संतुष्टि में निवेश करते हैं, वे संकटों का बेहतर सामना कर पाते हैं। प्राकृतिक आपदाओं, महामारी या बाज़ार में गिरावट जैसी अप्रत्याशित घटनाओं के दौरान, ये व्यवसाय तेज़ी से उबरते हैं क्योंकि उन्होंने पहले से ही सुरक्षात्मक तंत्र बना रखा होता है। कानूनी सुरक्षित आश्रय प्रावधान कानूनी संदर्भ में, सुरक्षित आश्रय प्रावधान उन कानूनों या विनियमों को संदर्भित करते हैं जो व्यक्तियों या संगठनों को दायित्व से बचाते हैं, यदि वे निर्दिष्ट मानकों या आवश्यकताओं का पालन करते हैं। उदाहरण के लिए, कंपनियाँ यदि निर्धारित साइबर सुरक्षा मानकों, वित्तीय रिपोर्टिंग नियमों या पर्यावरणीय विनियमों का पालन करती हैं, तो अप्रत्याशित घटनाओं के बावजूद उन्हें कुछ कानूनी परिणामों से सुरक्षा मिल सकती है। ये प्रावधान जिम्मेदार व्यवहार को प्रोत्साहित करते हैं और जटिल नियामक वातावरण में व्यवसायों के लिए स्पष्टता प्रदान करते हैं। यह नवाचार को बढ़ावा देते हैं क्योंकि वे अनावश्यक कानूनी अनिश्चितता को कम करते हैं, बिना जवाबदेही से समझौता किए। कर्मचारियों के लिए सुरक्षित आश्रय एक उत्पादक कार्यस्थल वह है जहाँ कर्मचारी शारीरिक और मानसिक रूप से सुरक्षित महसूस करते हैं। संगठन जो सम्मान, विविधता, समावेशन और खुले संचार को प्रोत्साहित करते हैं, वे ऐसा वातावरण बनाते हैं जहाँ लोग बिना भेदभाव या उत्पीड़न के डर के अपने सर्वोत्तम विचार प्रस्तुत कर सकते हैं। मुख्य विशेषताएँ: समान अवसर निष्पक्ष नीतियाँ मानसिक स्वास्थ्य समर्थन पारदर्शी शिकायत तंत्र नेतृत्व की जवाबदेही सम्मानजनक संचार सुरक्षित महसूस करने वाले कर्मचारी अधिक प्रेरित, उत्पादक और वफादार होते हैं, जिससे संगठन की सफलता में सकारात्मक योगदान मिलता है। वित्तीय योजना में सुरक्षित आश्रय वित्तीय सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण सुरक्षित आश्रय है। व्यक्ति और व्यवसाय दोनों ही मुद्रास्फीति, बाज़ार अस्थिरता, चिकित्सा आपातकाल या अप्रत्याशित खर्चों जैसी अनिश्चितताओं का सामना करते हैं। वित्तीय सुरक्षित आश्रय बनाने के उपाय: आपातकालीन बचत बनाए रखना निवेशों का विविधीकरण उपयुक्त बीमा खरीदना ऋण का जिम्मेदारी से प्रबंधन सेवानिवृत्ति की योजना बनाना वित्तीय लक्ष्यों की नियमित समीक्षा ये उपाय कठिन समय में स्थिरता प्रदान करते हैं और आर्थिक झटकों के प्रति संवेदनशीलता को कम करते हैं। समुदाय और सामाजिक सुरक्षित आश्रय समुदाय भी सुरक्षित आश्रय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्कूल, स्वास्थ्य संस्थान, आश्रय स्थल, सामुदायिक केंद्र और सहायता संगठन कमजोर आबादी को सुरक्षा और सहायता प्रदान करते हैं। मजबूत समुदाय सहयोग, परस्पर सम्मान और साझा जिम्मेदारी को प्रोत्साहित करते हैं। आपात स्थितियों जैसे बाढ़, भूकंप या सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के दौरान, सामुदायिक सुरक्षित आश्रय जीवन की रक्षा और पुनर्प्राप्ति में महत्वपूर्ण हो जाते हैं। पर्यावरणीय सुरक्षित आश्रय जलवायु परिवर्तन ने पर्यावरणीय सुरक्षित आश्रयों की आवश्यकता को उजागर किया है। सतत बुनियादी ढाँचा, संरक्षित पारिस्थितिकी तंत्र, हरित शहरी योजना और आपदा-प्रतिरोधी निर्माण समुदायों को चरम मौसम घटनाओं का सामना करने में मदद करते हैं। नवीकरणीय ऊर्जा, जल संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण में निवेश न केवल प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित करता है बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित जीवन स्थितियाँ भी बनाता है। आगे का मार्ग जैसे-जैसे तकनीक विकसित होती है और वैश्विक जोखिम अधिक परस्पर जुड़े होते जाते हैं, सुरक्षित आश्रय की परिभाषा भी विस्तृत होती जाएगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल शासन, डेटा गोपनीयता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग यह तय करेंगे कि समाज सुरक्षित वातावरण कैसे बनाते हैं। सफलता सरकारों, व्यवसायों, शैक्षणिक संस्थानों और नागरिकों के सहयोग पर निर्भर करेगी। सुरक्षित आश्रय अब केवल भौतिक स्थानों तक सीमित नहीं हैं—यह ऐसे तंत्र बनाने के बारे में है जो विश्वास जगाएँ, नवाचार को प्रोत्साहित करें और लोगों को उभरते जोखिमों से बचाएँ। निष्कर्ष सुरक्षित आश्रय केवल शरण का स्थान नहीं है—यह विकास, लचीलापन और विश्वास की नींव है। चाहे डिजिटल सुरक्षा, व्यवसाय संचालन, कानूनी संरक्षण, वित्तीय योजना, कार्यस्थल या समुदायों में लागू किया जाए, यह अवधारणा तैयारी और जिम्मेदारी पर जोर देती है। आज की तेज़ी से बदलती दुनिया में, जो संगठन और व्यक्ति सुरक्षित आश्रय बनाने में निवेश करते हैं, वे अनिश्चितताओं को पार करने और नए अवसरों को हासिल करने के लिए बेहतर स्थिति में होते हैं। ईमानदारी, नवाचार और सहयोग पर आधारित सुरक्षित वातावरण बनाकर, समाज भविष्य की चुनौतियों का अधिक आत्मविश्वास और स्थिरता के साथ सामना कर सकता है।  

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Delimitation Bill : Redrawing India’s Electoral Map for Fair Representation

BY: Sonia Bansal, Editor at NewsPatrolling.com India, the world’s largest democracy, is built on the principle that every citizen deserves equal representation in the country’s legislative institutions. As populations shift over time due to migration, urbanization, and demographic changes, maintaining this balance becomes increasingly challenging. This is where the concept of delimitation comes into play. Although often referred to as the “Delimitation Bill,” it broadly represents the legal and constitutional framework that enables the redrawing of electoral constituency boundaries to ensure fair and equitable representation. Delimitation is the process of redefining the boundaries of parliamentary and state assembly constituencies based on population data from the latest Census. Its primary objective is to ensure that each elected representative speaks for a roughly equal number of citizens, thereby upholding the democratic principle of “one person, one vote.” Understanding Delimitation In India, delimitation is carried out by the Delimitation Commission, an independent statutory body appointed by the Central Government. The Commission typically includes a retired Supreme Court judge as its chairperson, the Chief Election Commissioner, and the respective State Election Commissioners. Once the Commission finalizes its recommendations, they have the force of law and cannot ordinarily be challenged in court. The process involves: Redrawing the boundaries of Lok Sabha and State Legislative Assembly constituencies. Allocating reserved constituencies for Scheduled Castes (SCs) and Scheduled Tribes (STs) based on their population. Ensuring that constituencies have, as far as possible, equal populations while considering geographical features, administrative boundaries, and communication facilities. Constitutional Provisions The Constitution of India provides the legal foundation for delimitation through Articles 82 and 170. After every Census, Parliament is empowered to enact legislation to facilitate the readjustment of constituencies. The Delimitation Acts passed by Parliament authorize the establishment of the Delimitation Commission. However, the allocation of Lok Sabha seats among states has been frozen for several decades. Initially frozen in 1976 to encourage states to adopt effective family planning measures without fearing a reduction in political representation, this freeze was later extended through the 84th Constitutional Amendment until the first Census conducted after 2026. While constituency boundaries were revised based on the 2001 Census, the total number of seats allocated to each state remained unchanged. Why Is Delimitation Important? Population growth in India has not been uniform across states. Southern and several western states have generally experienced slower population growth due to successful implementation of education and family welfare measures. On the other hand, several northern and central states have witnessed relatively higher population growth. As a result, many constituencies today represent vastly different population sizes. Some Members of Parliament represent over three million people, while others represent significantly fewer. Delimitation seeks to address such imbalances and make representation more equitable. A fresh delimitation exercise could also improve governance by: Making representation more balanced. Reflecting urban expansion and migration. Ensuring newly developed regions receive adequate political representation. Strengthening the democratic legitimacy of elections. Key Concerns and Challenges Despite its democratic objectives, delimitation remains a politically sensitive issue. One of the biggest concerns is the potential redistribution of parliamentary seats among states. States that have successfully controlled population growth worry that they may lose relative political influence if seat allocation is based solely on population. Conversely, states with higher population growth argue that greater populations deserve proportionately greater representation. Another challenge involves balancing numerical equality with geographical realities. Remote, mountainous, tribal, and sparsely populated regions often require special consideration to ensure effective representation despite having smaller populations. Political parties also closely watch the delimitation process because changes in constituency boundaries may significantly alter electoral prospects. While the Delimitation Commission functions independently, political debates surrounding its outcomes are almost inevitable. Potential Impact on Indian Politics The next nationwide delimitation exercise is expected to have far-reaching consequences for India’s political landscape. It could alter the balance of representation in the Lok Sabha, influence coalition politics, reshape electoral strategies, and affect the distribution of political power among states. Urban areas experiencing rapid population growth may receive greater representation, while rural constituencies could undergo substantial boundary adjustments. Political parties will need to adapt to changing voter demographics and newly constituted constituencies. The exercise may also renew discussions on increasing the total strength of the Lok Sabha so that representation improves without significantly reducing any state’s relative influence. Such proposals aim to balance demographic fairness with federal harmony. The Way Forward Delimitation is an essential democratic exercise that ensures electoral representation remains aligned with changing population realities. However, given India’s vast diversity and federal structure, the process must be conducted with transparency, impartiality, and sensitivity toward regional concerns. Any future legislation or policy related to delimitation should strive to balance the constitutional principle of equal representation with the legitimate concerns of states that have invested heavily in population stabilization and socio-economic development. Broad political consensus, public awareness, and institutional independence will be critical to maintaining confidence in the process. Conclusion Delimitation is more than a technical redrawing of electoral boundaries—it is a cornerstone of representative democracy. As India prepares for its next phase of electoral reforms following the post-2026 Census, the debate surrounding delimitation will continue to shape the country’s political future. If implemented fairly and transparently, the delimitation process can strengthen democratic institutions, improve representation, and ensure that every citizen’s vote carries equal value in the world’s largest democracy.

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फोर्टिस नोएडा ने किर्गिस्तान के 51-वर्षीय मरीज की जीवन रक्षा के लिए ‘लैपरोस्कोपिक डुअल-लोब लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांट’ किया जो कि दुनियाभर में अपनी किस्म का पहला मामला है

मरीज की दोनों बेटियों ने अपने पिता को एंड-स्टेज लिवर रोग से बचाने के लिए अपने लिवर के हिस्से दान किए दुनिया में अपनी तरह के इस पहले मामले में, दोनों डोनर्स की लिवर डोनेशन सर्जरी मिनीमॅली इन्वेसिव लैपरोस्कोपिक तकनीकों की सहायता से की गई  नई दिल्ली : फोर्टिस हॉस्पीटल नोएडा ने एक शानदार उपलब्धि अपने नाम दर्ज कराते हुए दुनिया में पहली बार लैपरोस्कोपिक डुअल-लोब लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांट को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। इस जटिल प्रक्रिया को किर्गिस्तान के 51-वर्षीय मरीज पर किया गया जो हेपेटाइटिस बी इंफेक्शन से प्रभावित होने के बाद एंड-स्टेज लिवर रोग से ग्रस्त हो चुके थे। डॉ. विवेक विज, चेयरमैन, लिवर ट्रांसप्लांट एंड हेपाटोबिलियरी साइंसेज़, फोर्टिस हॉस्पीटल नोएडा के नेतृत्व में, अस्पताल की मल्टीडिसीप्लीनरी ट्रांसप्लांट टीम द्वारा की गई इस सर्जरी के परिणाम सकारात्मक रहे। सर्जरी के बाद, मरीज को स्थिर हालत में अस्पताल से छुट्टी दी गई, जबकि उनकी दोनों बेटियों ने भी, जिनकी उम्र 20 और 21 वर्ष थी, ठीक प्रकार से स्वास्थ्यलाभ कर लिया है और अब उनकी हालत ठीक है। दुनिया में यह अपनी किस्म का पहला मामला है, जिसमें दोनों डोनर्स की लिवर डोनेशन सर्जरी को मिनीमॅली इन्वेसिव लैपरोस्कोपिक तकनीकों की सहायता से किया गया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें कम दर्द हुआ, छोटे आकार के चीरे लगाने से सर्जरी के बाद कम तकलीफ से गुजरना पड़ा और रिकवरी भी तेजी से हुई। प्रत्येक डोनर सर्जरी करीब पांच घंटे चली जबकि रेसिपिएंट ट्रांसप्लांट सर्जरी को लगभग आठ घंटे में पूरा किया गया। मरीज के शरीर से निकाले गए लिवर की बाद में जांच से क्रोनिक हेपेटाइटिस की पुष्टि हुई जो हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस डी इंफेक्शन की वजह से हुआ था। साथ ही, लिवर को नुकसान भी काफी अधिक पहुंचा था। मरीज को डीकम्पन्सेटेड क्रोनिक लिवर रोग (लिवर फेलियर की गंभीर स्टेज जिसमें मरीज जॉन्डिस से पीड़ित होता है) की शिकायत के साथ फोर्टिस हॉस्पीटल नोएडा में भर्ती किया गया था। वह जॉन्डिस, रेकरेन्ट एसाइटिस (पेट में अत्यधिक मात्रा में तरल पदार्थ के असामान्य रूप से एकत्र होना), गैस्ट्रोइंस्टेस्टाइनल ब्लीडिंग तथा ऑल्टर्ड कॉन्शसनेस (चेतना में बदलाव) से भी पीड़ित थे। मरीज की विस्तृत मेडिकल जांच से लिवर फेलियर, पोर्टल हाइपरटेंशन, गंभीर किस्म के थ्रोम्बोसाइटोपीनिया (ऐसी मेडिकल कंडीशन जिसमें खून में प्लेटलेट्स की संख्या असामान्य रूप से कम हो जाती है) तथा खून का थक्का जमने में परेशानी जैसी समस्याओं की भी पुष्टि हुई। मरीज की मेटाबोलिक जरूरतों को देखते हुए सिंगल डोनर ग्राफ्ट अपर्याप्त था, तब ट्रांसप्लांट टीम ने मरीज की दोनों बेटियों द्वारा दिए गए लिवर ग्राफ्ट की मदद से डुअल-लोब लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांट करने का फैसला किया। इस मामले की जानकारी देते हुए, डॉ विवेक विज, चेयरमैन, लिवर ट्रांसप्लांट एंड हेपाटोबिलियरी साइंसेज़, फोर्टिस हॉस्पीटल नोएडा ने कहा, “डुअल लोब लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांटेशन वास्तव में, ट्रांसप्लांट सर्जरी के क्षेत्र में तकनीकी दृष्टि से सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण मानी जाती है और दुनिया में कुछ गिने-चुने केंद्रों पर ही इसे किया जाता है। दोनों डोनर्स के मामले में इसे पूरी तरह से लैपरोस्कोपिक तरीके से करना लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांटेशन की भी प्रमुख उपलब्धि है। इस मिनीमॅली इन्वेसिव तकनीक से मरीज को कम दर्द होता है, रक्तस्राव भी कम होता है और अस्पताल में रुकने तथा रिकवरी के समय में भी कमी आती है, और साथ ही, डोनर सुरक्षा के सर्वोच्च मानकों का भी पालन सुनिश्चित किया जाता है। इस उपलब्धि ने उन मरीजों के लिए भी उम्मीद दिखायी है जिन्हें बड़े लिवर ग्राफ्ट वॉल्यूम की आवश्यकता है और साथ ही, यह लिविंग डोनर्स की सुरक्षा तथा रिकवरी में भी सुधार करती है। यह डोनर की सुरक्षा के साथ समझौता किए बगैर सर्जरी के ट्रॉमा को भी कम करती है, और इस तरह से हम उक्त मामले में डोनर्स की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखने के साथ-साथ ऐसे मरीज के लिए जीवनरक्षक प्रत्यारोपण को सफलतापूर्वक अंजाम दे सके जो अन्यथा लिवर रोग के गंभीर होने के साथ-साथ अपरिवर्तनीय लिवर फेलियर के शिकार बन सकते थे।” मोहित सिंह, ज़ोनल डायरेक्टर, फोर्टिस हॉस्पीटल नोएडा ने कहा, “ट्रांसप्लांट संबंधी इस उपलब्धि ने क्लीनिकल उत्कृष्टता और नवाचार की दिशा में हमारे अथक प्रयासों को प्रदर्शित किया है। इसने न केवल लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांटेशन की सीमाओं में विस्तार किया है बल्कि फोर्टिस हॉस्पीटल नोएडा की बेहद जटिल किस्म के लिवर ट्रांसप्लांटेशन की भरोसेमंद वैश्विक मंजिल के तौर पर भी साख बढ़ायी है।”

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15 साल तक बैठे-बैठे सोने से लेकर चैन की साँस तक: एम्स डॉक्टरों ने हाई-रिस्क हार्ट पेशेंट की ज़िंदगी बदली

नई दिल्ली : गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए उन्नत हृदय उपचार कैसे जीवन बदल रहे हैं, इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण एम्स, नई दिल्ली में देखने को मिला। यहाँ डॉक्टरों ने एक 57 वर्षीय मरीज पर सफलतापूर्वक ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वाल्व इम्प्लांटेशन (TAVI) प्रक्रिया की, जिसे पहले पारंपरिक ओपन-हार्ट सर्जरी के लिए बहुत अधिक जोखिम वाला माना गया था। 135 किलो वजन वाले इस मरीज को गंभीर एओर्टिक वाल्व रोग था, साथ ही कई अन्य बीमारियाँ और हृदय की कार्यक्षमता (LVEF) मात्र 15% रह गई थी। इस वजह से उसे पारंपरिक वाल्व रिप्लेसमेंट सर्जरी के लिए अस्वीकार कर दिया गया था। सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि मरीज की बिगड़ती हालत ने उसकी जीवन-गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित किया था। लगभग 15 वर्षों तक वह लेटकर सो नहीं पाया और सांस फूलने के कारण उसे बैठकर ही सोना पड़ता था। मामले की जटिलता को देखते हुए एम्स की बहु-विषयक हार्ट टीम ने मरीज का गहन मूल्यांकन किया और TAVI प्रक्रिया की सिफारिश की—यह एक न्यूनतम इनवेसिव तकनीक है जिसमें बिना ओपन-हार्ट सर्जरी किए वाल्व बदला जा सकता है। 29 मिमी Sapien 3 Ultra Resilia वाल्व का उपयोग कर यह प्रक्रिया सफलतापूर्वक की गई। टीम में शामिल थे: प्रो. नितीश नाइक, वरिष्ठ परामर्शदाता एवं कार्डियोलॉजी प्रोफेसर (पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त) डॉ. रविंदर सिंह राव, चेयरमैन, RHL हार्ट सेंटर, हेड – कॉम्प्लेक्स एंजियोप्लास्टी – TAVI प्रोग्राम, वरिष्ठ परामर्शदाता इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी, लीलावती अस्पताल, मुंबई डॉ. अमिताभ सत्संगी, असिस्टेंट प्रोफेसर – CTVS प्रक्रिया के बाद मरीज ने उल्लेखनीय सुधार दिखाया—लक्षणों में कमी और हृदय की कार्यक्षमता में स्पष्ट सुधार। डॉ. रविंदर सिंह राव ने कहा, “गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस और एडवांस्ड हार्ट फेल्योर वाले मरीजों के पास अक्सर सीमित विकल्प होते हैं। जब सर्जरी संभव नहीं होती, TAVI एक सुरक्षित और प्रभावी विकल्प साबित होता है। यह केस दिखाता है कि समय पर हस्तक्षेप, उन्नत तकनीक और सहयोगी हार्ट टीम दृष्टिकोण से सबसे हाई-रिस्क मरीज भी उत्कृष्ट परिणाम पा सकते हैं।” विशेषज्ञों ने बताया कि TAVI अब उन मरीजों के लिए पसंदीदा विकल्प बनता जा रहा है जो उच्च या निषेधात्मक सर्जिकल जोखिम में हैं। पारंपरिक सर्जरी की तुलना में यह कैथेटर-आधारित प्रक्रिया कम आघात पहुँचाती है, जल्दी रिकवरी देती है और सही मरीजों में बेहतर परिणाम देती है। एम्स के विशेषज्ञों ने ज़ोर दिया कि ऐसे जटिल मामलों की सफलता हार्ट टीम मॉडल पर निर्भर करती है, जहाँ इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट, कार्डियक सर्जन, इमेजिंग विशेषज्ञ, एनेस्थेसियोलॉजिस्ट और क्रिटिकल केयर एक्सपर्ट मिलकर मरीज का मूल्यांकन और प्रबंधन करते हैं।

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IFFD 2026 : स्वतंत्र फ़िल्में – अवसर और चुनौतियाँ

IFFD 2026 के CineXchange मंच पर स्वतंत्र सिनेमा की वास्तविकताओं पर एक महत्वपूर्ण चर्चा हुई। इस सत्र में विंटा नंदा, अरन्या सहाय, तनमय शेखर, मोलश्री, बरनाली रे शुक्ला, पुबाली चौधरी और डिंपल दुगर जैसे प्रतिष्ठित फ़िल्मकार शामिल हुए। चर्चा का केंद्र स्वतंत्र फ़िल्मों के सामने आने वाली चुनौतियाँ और अवसर रहे। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि स्वतंत्र सिनेमा का सबसे बड़ा संघर्ष वित्तीय संसाधनों की कमी है। बड़े बजट और स्टारकास्ट के अभाव में इन फ़िल्मों को निवेशकों और वितरकों का समर्थन मिलना कठिन होता है। विंटा नंदा ने कहा कि स्वतंत्र फ़िल्में समाज की सच्चाइयों और अनकही कहानियों को सामने लाती हैं, लेकिन इन्हें बनाने के लिए साहस और धैर्य की आवश्यकता होती है। अरन्या सहाय ने इस बात पर ज़ोर दिया कि डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ने स्वतंत्र फ़िल्मों को नई ऊर्जा दी है। पहले जहाँ थिएटर रिलीज़ ही एकमात्र विकल्प था, वहीं अब ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ने इन फ़िल्मों को वैश्विक दर्शकों तक पहुँचाने का अवसर दिया है। तनमय शेखर ने कहा कि कहानी कहने की शैली ही स्वतंत्र सिनेमा की सबसे बड़ी ताक़त है, जो इसे मुख्यधारा से अलग पहचान देती है। बरनाली रे शुक्ला और पुबाली चौधरी ने वितरण की चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि स्वतंत्र फ़िल्मों को थिएटर तक पहुँचाना अब भी कठिन है, लेकिन फ़िल्म महोत्सव और डिजिटल माध्यम इनकी आवाज़ को बुलंद कर रहे हैं। वहीं डिंपल दुगर ने कहा कि सहयोग और नेटवर्किंग ही स्वतंत्र फ़िल्मकारों के लिए आगे बढ़ने का रास्ता है। इस सत्र से यह निष्कर्ष निकला कि स्वतंत्र सिनेमा भारतीय फ़िल्म उद्योग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो नई कहानियों और प्रयोगशीलता को जन्म देता है। चुनौतियाँ चाहे कितनी भी हों, अवसर भी उतने ही व्यापक हैं। IFFD 2026 का यह संवाद स्वतंत्र फ़िल्मों के भविष्य को दिशा देने वाला साबित हुआ।

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फ़िल्म वितरण में बदलते रुझान: IFFD 2026 में CineXchange पर गहन चर्चा

IFFD 2026 के तीसरे दिन आयोजित CineXchange सत्र में भारतीय फ़िल्म वितरण के बदलते परिदृश्य पर उद्योग के दिग्गजों ने विचार साझा किए। इस चर्चा में संजय राम, अनिल थडानी, जी.पी. विजयकुमार और गायत्री गुलियानी जैसे प्रमुख वितरकों ने भाग लिया। उन्होंने बताया कि कैसे पारंपरिक थिएटर रिलीज़ और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के बीच संतुलन लगातार बदल रहा है। पहले जहाँ फ़िल्मों की सफलता का पैमाना केवल बॉक्स ऑफिस कलेक्शन होता था, वहीं अब ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म और डिजिटल स्ट्रीमिंग ने दर्शकों तक पहुँचने के नए रास्ते खोल दिए हैं। अनिल थडानी ने कहा कि बड़े बजट की फ़िल्में अब भी थिएटर में रिलीज़ होकर ही अपनी पहचान बनाती हैं, लेकिन छोटे और मध्यम बजट की फ़िल्मों के लिए डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म एक सुरक्षित विकल्प बन चुके हैं। संजय राम ने इस बात पर ज़ोर दिया कि क्षेत्रीय सिनेमा को डिजिटल माध्यम से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दर्शक मिल रहे हैं। जी.पी. विजयकुमार ने वितरण रणनीतियों में लचीलापन अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि दर्शकों की बदलती पसंद को ध्यान में रखते हुए निर्माताओं को थिएटर और डिजिटल दोनों माध्यमों का संतुलित उपयोग करना चाहिए। वहीं गायत्री गुलियानी ने यह स्पष्ट किया कि भविष्य में सहयोगी मॉडल ही सफल होंगे, जहाँ निर्माता, वितरक और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म मिलकर काम करेंगे।

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