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अष्टभुजा धारी मां दुर्गा के नौ स्वरूपों का पूजा पर्व है नवरात्रि…


आत्मिक जागरण के नौ शुभ दिन

शिव की शक्ति मां भवानी ने बहुरूप धारण कर समस्त आसुरी संपदा व संप्रदाय को समाप्त किया। इस वर्णन का आध्यात्मिक भावार्थ व संदेश महत्वपूर्ण है।

ब्रह्मा कुमार चक्रधारी

अष्टभुजा धारी मां दुर्गा के नौ स्वरूपों का पूजा पर्व है नवरात्रि। देवी दुर्गा को दुर्गपारा कहते हैं। अर्थात दुर्गम संकट से पार कराने वाली। वे दुर्गति नाशिनि भी हैं। यानी दुर्गुणों से हुई हमारी दुर्गति का नाश करने वाली मां। वे आसुरीय प्रवृत्तियों को दमन करते समय रौद्र रूपा हैं। वहीं सदुणों से शृंगारी हुआ उनका रूप अत्यंत सौम्य व दर्शनीय है।

पुराणों में वर्णन है कि जब सृष्टि में आसुरी अत्याचार बढ़ गए, तो समस्त देवता उपाय हेतु प्रजापिता ब्रह्मा के पास गए। फिर, सबने मिलकर सर्व आत्माओं के पिता, परमपिता परमात्मा शिव से प्रार्थना की। तब तीनों देवों के प्रभाव से दिव्य प्रकाश उत्पन्न हुआ और उससे आदि शक्ति प्रकट हुईं। सभी देवताओं ने अपने-अपने विशेष अस्त्र-शस्त्रों से उन प्रकट हुई महादेवी को सुसज्जित किया। ताकि, समस्त देवों की शक्ति वे धारण करें और उससे अंश और वंश सहित असुरों का विध्वसं हो। कालक्रम में, शिव की शक्ति मां भवानी ने बहुरूप धारण कर समस्त आसुरी संपदा व संप्रदाय को समाप्त किया। इस विजय के उत्सव और देवी शक्ति की उपासना में नवरात्रि आते हैं। इसका अध्यात्मिक भावार्थ व संदेश महत्वपूर्ण है। उसे भी समझना चाहिए।

वास्तविकता में देवी के ये नौ दिन आत्मिक उन्नति की उपासना के दिन भी हैं। और विश्व कल्याण की शक्ति को जाग्रत करने के दिन भी। आज के कलियुगी मनुष्यों में दैवी और दानवीय प्रवृत्तियां कम या अधिक मात्रा में प्रबल हैं। सारी मानवीय प्रवृत्तियां चाहे अच्छी हों या बुरी, असल में इंसान के अनुरूप सोच-विचार, दृष्टि व वृत्तियों की ही उपज हैं। जिन प्रवृत्तियों को ज्यादा अपनाया जाएगा, वे बढ़ेंगी।

देवी गुण व दैवी शक्तियां अंतरात्मा में ही हैं। उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान और रूहानी योगध्यान से जगा सकते हैं। उनकी मात्रा और प्रभाव को बढ़ा सकते हैं। ताकि, हमारे अंदर दुखदायी दानवी दुर्गुणों की मात्रा व प्रभाव क्षीण व निस्प्रभ हो जाए। इस आंतरिक जागरण व सशक्तिकरण प्रक्रिया को ही पुराणों में विभिन्न देवी-देवता, दानव व परमात्मा शिव के चरित्रों द्वारा बताया गया है। इसी को हम नवरात्रि पर, देवी आवाह्न व जागरण के रूप में मनाते हैं।

देवी कथा में उल्लेख है कि आसुरी तत्वों को पराभूत करने हेतु, देवताओं ने मां भवानी को दिव्यास्त्र दिए। इसका भी अर्थ यही है कि परमात्मा के दिव्य ज्ञान व योग साधना द्वारा हमें अंदर के देवत्वों और दिव्य शक्तियों को पाना है। तभी अंतस में, आसुरी स्वभावों का अंत और दैवी संस्कारों का शृंगार हम कर सकते हैं।

मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों का दर्शन वास्तव में अंतरात्मा का दर्शन है। देवीजी की उपासना हमारे लिए आत्म अवलोकरन, आत्म विश्लेषण एवं बुराइयों से अच्छाई की ओर आत्म परिवर्तन का शुभ अवसर है।

उपासना का शब्दिक अर्थ है, समीप रहना। सही उपासना तब होगी, जब हम सच्चे मन और हृदय से मां दुर्गा की अष्टभुजा रूपी अष्ट शक्ति जैसे सहने, समाने और सहयोग करने के व्यावहारिक गुण और शक्तियों को अपना पाएंगें।
यही वास्तव में नवरात्रि उपासना वह उपवास (निकट वास) का मूल अर्थ है। साभार : एचटी


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