‘’सब व्यक्तियों में पार्थ मैं ही सर्वगुण संपन्न हूं- सिर्फ वोट लेने के लिए ही, पार्थ मैं विपन्न हूं’’- उज्जैन के वरिष्ठ व प्रतिष्ठित कवि श्री सुभाष गौड़ के काव्य संग्रह “युग की गीता’’ की ये पंक्तियां मौजूदा युग के खुरदरे व कड़वे यथार्थ को ज्यों का त्यों अभिव्यक्त करती हैं। यह काव्य संग्रह वस्तुत: हृदय की कोमल भावनाओं, समाज की विसंगतियों, राजनैतिक विद्रूपताओं और भविष्य की चिंताओं को उकेरता हुआ संवेदनाओं का इंद्रधनुष है। इसमें प्रेम की गहनतम अभीप्सा, उत्कंठा और अनुभव को कागज के पन्नों पर इस तरह उतारा गया है कि आप उसे उसकी तीव्रता के साथ महसूस कर सकें। मसलन एक कविता ‘इक तुम्हारा साथ पाकर’ की लयात्मकता, मधुरता और जीवंतता बेमिसाल है। कविता का एक अंश देखिए कि ‘’एक तुम्हारे साथ यह मौसम बदलकर रह गया है, एक तुम्हारे संग से हर ढंग बदलकर रह गया है, एक तुम ही हो कि जिससे सब बदलकर रह गया है, जिंदगी के गीत का सरगम बदलकर रह गया है’’- दरअसल यह प्रेम की जीत के जश्न का गीत है। इस कविता में हमसफर की अहमियत, उसकी मौजूदगी, अहसास के तल पर हुए बदलाव- इन सभी की बेहद सुंदर अभिव्यक्ति हुई है।

वहीं आगे की कविता ‘मैं शब्दों का शिल्पकार’ में कवि अपनी भूमिका स्पष्ट करते हैं, जबकि एक और कविता ‘’युवकों से’ में कवि नौजवानों को प्रेरित करते और सुझाव देते हुए नजर आते हैं। यह दर्शाता है कि कवि के मन में समाज और देश के भविष्य को लेकर बड़ी गहरी चिंता है। कविताओं की श्रृंखला में कविताएं भी सिलसिलेवार तरीके से सुसज्जित है। उदाहरण के तौर पर “मौसम ने करवट ली’’ के बाद ‘कहां विश्राम लेगी’ में उनके अनुभूति की कोयल लय-ताल के साथ कूकती है। एक कविता ‘’बाहर शोर तमाशा है’’ की पंक्तियां देखिए- ‘कोशिश हर दम चलती है- किस्मत लेकिन छलती है’- निश्चित ही यह जीवन के अनिश्चित यथार्थ और अनुभव से गुंजित पंक्तियां हैं।
कवि प्रेम में न जताने की कला को बड़े ही सपाट शब्दों में अभिव्यक्त करते हैं- प्यार जब करते हो तो छुपाते क्यों हो- बेरुखी हमसे है, ये दिखाते क्यों हो। देश की मौजूदा आंतरिक सुरक्षा की समस्या पर भी उनकी कविता ‘पहले अपना घर साफ करो’ सीधे प्रहार करती हुई नजर आती है- यहां भीड़ लगी जयचंदों- जाफर और विभीषण की- पहले अपना घर साफ करो- फिर रण की हुंकार भरो। एक कविता का अंश देखिए कि ‘बदले हुए दौर में पैसे की हुकूमत – कैसे किधर से आया- कुछ ध्यान नहीं हैं- हालांकि इस कविता का शीर्षक देते हुए वरिष्ठ कवि से जल्दबाजी हो गई है या प्रकाशन की त्रुटि है, यह नहीं मालूम लेकिन इस कविता का शीर्षक होना चाहिए था- ‘रवायत’। एक दूसरी कविता की पंक्तियां देखिए- बरसों बाद मिले हम तुम जब- दिल धड़का और आंखें रोई- लेकिन तुम पर असर नहीं कुछ साफ दिखाई देता है। कविता ‘शब्दों के जंगल’ की यह पंक्तियां कितनी सटीक है कि ‘शब्दों से भावना की गोद नहीं भरती है, सही भावना तो बस मौन में उतरती है।
कवि सुभाष गौड़ की कविताओं में प्रेम बेहद सरल-सहज रूप में अभिव्यक्त हुई है- आओ के बैठ कर के कहीं गुफ्तगूं करें – कुछ मेरी सुनो- अपनी सुना जाओ किसी दिन। ऐसी ही एक कविता का अंश देखिए- वो मिला भी है तुझसे तो अजनबी की तरह- फिर तेरा उससे वास्ता क्या है! सुभाष गौड़ जी के दोहे तो सभी एक से बढ़कर एक हैं- एक बानगी देखिए कि ‘रिश्ते-नाते व्यर्थ हैं, अगर नहीं है अर्थ- संबंधों की आजकल, यही है पहली शर्त। काव्य संग्रह के आखिर में जो क्षणिकाओं एवं मुक्तकों का संग्रह है- वो लाजवाब है। लंबी कविता ‘युग की गीता’ को पढ़ते हुए अलग-अलग विषयों पर उनका व्यंग्य, आनंद का सहज प्रवाह भी है तो वक्त के सामने तीखा सवाल भी- विस्तार से क्या काम तुझको- जान लो यह सार है- बस एक मेरे वंश से ही लोकतंत्र आबाद है। इस कविता से गुजरते हुए इस बात का भी आभास हो जाता है कि क्यों कवि ने इस काव्य संग्रह का नाम- ‘युग की गीता’ रखा है। कवि ने युग की छवि को व्यंग्य और तंज के सहारे इस तरह रचा है कि ‘युग की गीता’ आज के समय को समझने का एक आदर्श पाठ बन जाती है— तीखा, सचेत और निर्भीक









