फिल्म: हैवान
डायरेक्टर: प्रियदर्शन
कलाकार: बोमन ईरानी, अक्षय कुमार, सैफ अली खान, श्रिया पिलगांवकर, सैयामी खेर, राजपाल यादव. मोहनलाल, असरानी, शारिब हाशमी
रेटिंग: 2.5 स्टार
Written by : कौशल कुमार
सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज और मनुष्य की आत्मा का दर्पण होता है। प्रियदर्शन की फिल्म हैवान इसी दर्पण में हमें झाँकने का अवसर देती है। यह फिल्म हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि असली हैवान कौन है, वह जो अंधेरे जंगलों में घूमता है या वह जो इंसान के भीतर छिपा हुआ है? हैवान की असली ताकत उसकी सतही लड़ाइयों में नहीं, बल्कि उन अदृश्य जंगों में है जो इंसान के मन के भीतर चलती रहती हैं। हैवान की कहानी केवल मुक्कों और हथियारों की नहीं, बल्कि दिमागी चालों और अदृश्य रणनीतियों की भी है। जहां एक नेत्रहीन योद्धा उस दुश्मन से भिड़ता है जिसकी हर अगली चाल धुंध में छिपी होती है। इस संघर्ष में हथियारों से ज्यादा काम आता है सहज प्रवृत्ति, और शारीरिक बल से कहीं अधिक मायने रखता है मानसिक संतुलन। हर कदम पर बढ़ता है अस्तित्व का दबाव, हर सांस के साथ गहराता है जीवन को बचाने का खेल। प्रियदर्शन ने इस कहानी को अक्षय और सैफ के बिल्कुल नए रूपों के साथ परदे पर उतारा है, जिससे ‘हैवान’ एक ऐसी थ्रिलर बन जाती है, जो बॉलीवुड की आम एक्शन फिल्मों से अलग अपनी पहचान गढ़ती है। 162 मिनट की यह यात्रा दर्शकों को भय, साहस और भावनाओं के ऐसे संसार में ले जाती है जहाँ हर दृश्य एक प्रश्न बनकर सामने आता है।

कहानी: हैवान की कहानी एक दृष्टिहीन मार्शल आर्ट्स मास्टर श्याम (सैफ अली ख़ान) की है, जो एक छोटी बच्ची का संरक्षक बनता है। उसकी दुनिया शांत और सरल है, लेकिन अचानक एक मनोरोगी परशुराम (अक्षय कुमार) उस बच्ची को निशाना बनाता है, जिसके पीछे का कारण अक्षय कुमार के परिवार की मौत होती है। यहाँ से शुरू होती है एक जंग, न केवल अच्छाई और बुराई की, बल्कि इंसान की सीमाओं और उसकी ताकत की। ‘दृष्टिहीन नायक (सैफअली ख़ान) अपनी आँखों से नहीं, बल्कि अपनी संवेदनाओं से देखता है। उसकी सुनने की शक्ति, उसकी स्पर्श की अनुभूति और उसकी आत्मा की दृढ़ता उसे एक असाधारण योद्धा बना देती है।

अभिनय: फिल्म में सैफ अली ख़ान नेे अपनी दृष्टिहीनता को कमजोरी नहीं, बल्कि शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। उनके अभिनय में संवेदनशीलता और दृढ़ता का अद्भुत संतुलन है। दर्शकों को उनको रूप बेहद दमदार लगेगा।
वहीं अक्षय कुमार का एक मनोरोगी खलनायक के रूप में उनका अभिनय भयावह है। उनकी आँखों की चमक और चेहरे की ठंडी मुस्कान दर्शकों को भीतर तक हिला देती है। बोमन ईरानी एक चीफ जस्टीस के रूप में न्याय और नैतिकता का प्रतीक बनकर कहानी को गहराई देते हैं।
कहानी में वहीं श्रिया पिलगाँवकर और सैयामी खेर सहायक भूमिकाओं में भावनात्मक स्पर्श जोड़ती हैं। तो अभिनेता राजपाल यादव एक आॅटो वाले ड्राईवर के रूप में सहायक रोल में नजर आते हैं। वैसे ही जैसे हर रोल में उनकी उपस्थिति दर्शकों को लुभाती है।
तकनीकी: निर्देशन की बात करें तो प्रियदर्शन ने कहानी को रहस्य और भावनाओं के संतुलन के साथ प्रस्तुत किया है। उन्होंने डर पैदा करने के लिए तकनीक का अति प्रयोग नहीं किया, बल्कि कहानी और अभिनय पर भरोसा किया। लेकिन फिल्म की सुस्त चाल और समय की अधिकता दर्शकों को जरूर बोर करेगी। अनावश्यक फिल्म को खींचा गया है। जबकी यह फिल्म दो घंटों में सिमट सकती थी।
सिनेमैटोग्राफी: वाकाई में फिल्म को जो फिल्मांकन किया गया है, जिसमें कैमरे ने अंधेरे गलियों, वीरान घरों और तनावपूर्ण लड़ाइयों को इस तरह कैद किया है कि दर्शक खुद को उसी माहौल में महसूस करते हैं। संगीत और बैकग्राउंड संगीत की बात करें तो, संगीतकार ने हर दृश्य को भावनाओं से भर दिया है। जब बच्ची डरती है, तो सुर भी काँपते हैं, जब नायक लड़ता है, तो ताल भी गूँजती है।
फिल्म में दृष्टिहीनता केवल शारीरिक स्थिति नहीं, बल्कि एक रूपक है। इससे हमें यह सीख मिलती है कि इंसान को देखने के लिए आँखों की जरूरत नहीं, बल्कि आत्मा की गहराई चाहिए। वहीं खलनायक का मनोरोगी रूप इंसान के भीतर छिपे अंधकार का प्रतीक है। एक छोटी बच्ची मासूमियत और भविष्य का प्रतीक है। उसकी रक्षा करना केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी मानवता का कर्तव्य है।

असल में फिल्म का मूल संदेश यह है कि साहस और संरक्षकता किसी भी कमजोरी से बड़ी ताकत होती है। यह हमें सिखाती है कि जब इंसान दूसरों की रक्षा के लिए खड़ा होता है, तो वह किसी भी हैवान से बड़ा योद्धा बन जाता है।
कहानी का सार : हैवान केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक अनुभव है। यह डराती है, रुलाती है, प्रेरित करती है और अंत में दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है। यह फिल्म हमें यह याद दिलाती है कि असली ताकत शरीर में नहीं, बल्कि मन और आत्मा में होती है। और जब इंसान अपनी आत्मा की शक्ति को पहचान लेता है, तो वह किसी भी हैवान से भिड़ सकता है।
रिव्यू तो आपने पढ़ा, लेकिन हैवान में और भी बहुत कुछ है देखने और सुनने के लिए, तो देर किस बात की फिल्म का अनुभव लेने और इसकी कहानी को बड़े पर्दे पर देखने के लिए आप परिवार और दोस्तों के साथ अपनी नजदीकी सिनेमाघर में जाकर हैवान से रू-ब-रू हो सकते हें।









