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लघुकथा : हुनर  


  • प्रो अंजना गर्ग ( म द वि रोहतक)

कनिका स्टेज पर थी। जोरदार तालियों के साथ लोग लगातार उसका स्वागत कर रहे थे । वह अपनी मां के लिए कह रही थी कि ऐसी मां सबको मिले जिसके अनुशासन से वह आज इस मुकाम तक पहुंची है। उसकी सुरीली आवाज मां की ही देन है। मां के कारण मुझे यह मौका मिला। मैं नमन करती हूं अपनी मां को और इस ट्रॉफी को मैं माँ के साथ ही लेना चाहूँगी। एनाउंसर कह रहा था कनिका की माता जी स्टेज पर आए। पहली पंक्ति में बैठी अनिता (कनिका की माँ) सोच रही थी काश मैंने वह गलतियां ना की होती जो ज्यादातर माँ बाप करते है ।कनिका का  स्कूल से आना, उसे खाना देना और फिर पहले होमवर्क खत्म करो आदेश दे देती।

कई बार कनिका गाना सीखने के लिए कहती तो वह साफ मना कर देती। उसे लगता उतने पैसे में मैथ्स , साइंस या इंग्लिश इम्प्रूव करवाऊंगी। लेकिन कनिका इस ताक में रहती कि माँ घर से बाहर कही जाए और वो अपने गाने का रियाज करे।अनिता को कनिका के गाल पर मारे तमाचे याद आ रहे थे जब नम्बर कम आने पर उसने उसकी क्लॉस लगा दी थी। उसके पति ने भी उसे समझाना चाहा पर उसे लगता था  अगर पढ़ाई में नंबर कम है तो बच्चे  कुछ नही , किसी काम के काबिल ही नहीं है। ऐसे बच्चों को तो जीवन में पूरी तरह फेल ही समझो।इसके वाबजूद कनिका ने छुप छुप कर अपना रियाज़ जारी रखा और उसकी लगन ने उसको आज यहां तक पहुंचा दिया । अनिता का मन कर रहा था कि वह चीख चीख कर  दुनिया की सभी मांओं को यह कहे कि जीवन में पढ़ना और नंबर लेना ही सब कुछ नही,अपने बच्चे के अंदर जो हुनर है उसे पहचानो और सही मुकाम तक उसे पहुंचने में मदद करो। ट्रॉफी मुख्य अतिथि के हाथ में थी और कनिका लेने के लिए  बार-बार अपनी मां को स्टेज पर बुला रही थी। पर अनिता का एक एक कदम मानो एक एक मन का हो गया था।


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